Monday, 1 January 2024

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है
साल बदला है
पर बदला है
तुम्हारा मन क्या?


है जश्न चारों ओर
उमंग का न बूझे छोर
पर क्या खोज पाए हो
अपने मन की डोर?


फैला है चहुँओर उजास
चांद भी लग रहा है पास
पर कहां छुपा है
तुम्हारा आकाश?


है जो चोट, दर्द, ग्लानि,
ईर्ष्या व बेबसी,
ले यह भारी गठरी 
गुजारोगे आखिर कितनी ही सदी।


साल बदलना सहज है
अब क्यू मन को टटोलना होगा
असल उल्लास समझोगे तभी
जब कस्तूरी मृग से मिलना होगा।

Monday, 31 July 2023

बेचैनियां मोहक सी

बेचैनियां ओढ़े बैठा शख्स
बड़ा मोहक सा लगता है।
उसके भीतर 
कुछ पाने की जिद है
उस पा लेने के पीछे 
कुछ खोने का डर भी।
उस डर से पार पाने के
कईं तरीके हैं उसके पास
पर हर तरीके के साथ हैं
कुछ डिस्क्लेमर।


ये बेचैनियाँ कब राहत देंगी
भला कौन जाने
पर तय है कि जब कभी
बेचैनियां दूर होंगी
चैन की परिभाषा कुछ बदली सी होगी।।


Monday, 3 July 2023

मां बाप की बढ़ती उम्र

मां बाप की बढ़ती उम्र
एक डर पैदा करती है।
एक ऐसा डर
जो बेजुबां है, बेतुका भी। 

डर लगता है कि
साथ छूट जाएगा
एक तेज हवा का झोंका आएगा
और जमीन से वृक्ष उखड़ जायेगा।

अनजान नहीं कि
मृत्यु ही सत्य है
पर शायद यह मोह और डर का चल रहा
शाश्वत नृत्य है।

अलसुबह हो यां देर रात
फोन की घंटी तनिक नहीं सुहाती है
ये मां बाप की बढ़ती उम्र
जाने क्यों भीतर ही भीतर सालती है।

Sunday, 23 April 2023

सहसा गए लोग

 (*सहसा = अचानक)


सहसा गए लोग 

दरअसल कभी नहीं जाते। 


वो लौटते हैं 

वो कईं बार लौटते हैं 

छोटी छोटी बातों में 

बड़ी लम्बी सी रातों में। 


वो लौटते हैं साधारण सी 

रोजाना की जरूरतों में,

वो लौटते हैं 

कमरों में

लट्टे लिबासों में

पकवानों के स्वाद में 

मिलते जुलते कद काठी इंसानों में,

अबूझे अहसासों में 

वो लौटते हैं 

ईश्वर से नाराज़गी के रूप में भी,

और वो छिपे रहते हैं 

हँसती आँखों  के ठीक पीछे।


ईश्वर को खत्म कर देनी चाहिए 

ये सहसा वाली अपनी निष्ठुर हरकतें 

क्योंकि ये इंसानी दिल 

'सहसा' हुई रुख़सियतें नहीं झेल पाता। 

Monday, 6 March 2023

कहो कि बुरा लगता है

गुलाल, पिचकारी, गुब्बारे 

गर बाइक पर सवार

कोई भी यूँ ही दे मारे  

तो आँखों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


होली की मस्ती का सुरूर 

नशे में हो चूर 

गर कोई करे भद्दे मजाक 

तो कानों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


गुजिया, घेवर, मठरी के साए में 

होली गीतों के फूहड़ लिबास में 

गर कोई करे कैसा भी अपमान

तो तन मन पर चढ़ा गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है।  

Monday, 13 February 2023

मन की ही आराधना है

 शिव ने चुना गृहस्थ जीवन 

बुद्ध ने त्याग दिया 

परन्तु दोनों ही निर्विकार हुए 

क्योंकि अपने मन को आकार दिया। 


त्याग एक साध्य है 

गृहस्थ एक साधना है 

सब मन का खेल है 

मन की ही आराधना है। 


वरन मन की थाह बड़ी दुर्गम है, 

लोभ, मोह, माया का वृहत ये संगम है,

पर ढूंढने दें इसे अपना रास्ता 

इसे ना दें किसी का वास्ता। 

Friday, 2 December 2022

कामकाजी स्त्रियां

स्त्रियां बड़ी शिद्दत से
घर बटोर ले जाया करती हैं किताबें
कि फुर्सत मिलते ही झट पढ़ लेंगी।
पर हर दफे बिना पन्ने पलटाए
ले आती हैं उन्हें वापस। कमोबेश उनका फुर्सत पाना भी
फुर्सत पाना नहीं होता।


फुर्सत में वो करती हैं
बहुतरे अंडररेटेड काम।
मसालेदानी में भरने लगती हैं
नमक और हल्दी,
फ्रीज में ढूंढने लगती हैं
परसों गिरी सब्जी के दाग,
पुरानी अखबारों के लिए ढूंढती हैं
एक नई जगह,
सर्द कपड़ों के लिए
छानती हैं पुरानी जगहें
और दसों कामों की फेहरिस्त लिए
घूमती हैं हॉल और किचन के भीतर बाहर।
दरअसल,
स्त्रियां किताबें खोलने से पहले
सिमट जाती हैं घर परिवार में।

Tuesday, 22 November 2022

मैं एक प्राइवेट कर्मचारी हूँ

 मेज से घूरती  धूल 

बिस्तर के छोरों से लटकती चदर 

फ्रिज के ऊपर रखी पिरामिडनुमा दवा बोतलें 

अलमारी के अंदर मचा घमासान 

ग़ुसलख़ाने की नाली पर आंदोलनरत केश 

मैले कपड़ों के पुलिंदे 

पानी को तरसते नन्हे पौधे 

गैस के चूल्हे पर जमा एक गैर जिद्दी दाग 

खाली नमक के डिब्बे के पास रखी भरी नमक की थैली 

दही हांडी वाले दृश्य जैसा डस्टबिन 

और अथक चेहरा 

मुझे पल पल एहसास दिलाता है कि 

मैं एक प्राइवेट कर्मचारी हूँ। 

Saturday, 24 September 2022

सुनो ! नौकरी करने वालों।

नौकरी उर्फ़ जॉब करने वालों, सुनो।

कुछ बातें तुम्हें कोई नहीं बताएगा

इसलिए तनिक ध्यान से सुनो।


किसी की रिकमेन्डेशन के बदले 

नौकरी खुद हासिल करना, 

क्योंकि अगर वो संस्था के अंदर हुआ 

तो अहसान तले दबे रहोगे।


तनख्वाह अपनी 

काबिलियत के हिसाब से पाना 

क्योंकि ज्यादा में घिसे जाओगे 

और कम में पिसे जाओगे। 


गर सीधे सादे हो तो 

थोड़ी चालाकियां सीख लेना, 

आँख कान खुले रखना, 

और नौकरी कितनी भी अच्छी हो 

स्वयं को निखारते रहना।


और अंत में यह....  

नौकरी बचाने की जगह 

अपनी आवाज़ बचाये रखना

क्योंकि आवाज़ ही वजूद है। 

Sunday, 4 September 2022

शिक्षक

अंडररेटेड काम

ओवररेटेड सम्मान 

कुछ और कर पाने में रहे नाकाम

इसलिए बन गए

शिक्षक राम 

यही लगता है न तुम्हें?


तो सुनो,

ये शिक्षक ही 

ओवररेटेड जॉब्स  का 

आधार है,

सबको समान समझा जाए 

इसका पैरोकार है,

इसकी गरिमा समझना 

इतना ना आसान है,

सिर्फ शिक्षक दिवस को ही जान पाओगे 

कि हरेक शिक्षक कितना महान है। 

Thursday, 25 August 2022

दर्द फौरी नहीं होता

 

रेलमपेल सी दुनिया में 

ठहराव नहीं होता

बारिश के बूँद सा गुम जाए 

दर्द इतना फौरी नहीं होता।


ये कुछ दिन मचलता है 

कुछ दिन दहकता है 

फिर जमकर बरसता है, 

पर दोस्त

ये किस्सा बरस जाने पर ही खत्म नहीं होता,

क्यूंकि दर्द इतना फौरी नहीं होता।


शांत समुद्र सा दिखे कुछ दिन 

फिर उद्वेलित सा 

फिर थमा सा 

और फिर रिसता रिसता 

गहरी पैठ पा जाता है, 

दरअसल दर्द जैसी शय का मुकाम 

इतना सस्ता नहीं होता 

दोस्त, दर्द फौरी नहीं होता।


जो तुम कहो कि 

दर्द की समय सीमा 

भी होनी चाहिए,

तो दोस्त 

घड़ी का कांटा और दर्द 

मित्रवत नहीं होता

और

गर तुम सोचो कि आंसुओं से 

तर होकर बाहर निकल आओगे 

तो जनाब फिर सुनो 

दर्द इतना फौरी नहीं होता।


Wednesday, 29 June 2022

देश एक भट्टी है

इंसान और इंसानियत की 

चल रही कट्टी है, 

साहिब, देश एक भट्टी है। 


अब चोखा अलग 

अलग लिट्टी है, 

ना कहो कि  

सबकी एक ही मिट्टी है 

साहिब, देश एक भट्टी है। 


आज प्रत्यक्ष है 

कल आशंकित है, 

भयभीत नजारों में भी 

उम्मीद लिए  बैठा 

कम्बख्त ये मन हठी है  

साहिब, देश एक भट्टी है। 



Sunday, 19 June 2022

पिता डरता है

मजबूत होती हैं माएं
पिता तो नाजुक सा होता है 
वो खुलकर रो लेती है 
पिता रोने से भी डरता है। 

स्वेटर बुनती मां है 
पिता ऊन लाता है
वो आम की फांके बांटती है 
पिता आम की मिठास ढूंढ लाता है। 

प्रेम की परिभाषा मां के हिस्से 
पिता का क्रोध जाना जाता है 
वो दुनिया की खूबसूरती सिखलाती है
पिता दुनिया से ही डरता है।

मां अपनी हर उम्र में
एक सी होती है
पर पिता जरूर बदलता है,
जवानी में कठोर
तो बुढ़ापे में नरम सा होने लगता है। 

यूं सोचो कि पिता तो आदमी है
फिर भला किससे डरता है!
अंदर की बात ये है कि पिता भी
एक आदमी से ही डरता है। 

































Friday, 6 August 2021

हिम्मती सा नजर आना

मुश्किल था.. 
मुश्किल था..
उन्हें रह रहकर खांसते देखना 
शरीर के तापमान का चढ़ना उतरना 
कमजोरी का आँखों से बदन के हर जर्रे तक जा पहुंचना 
और मुश्किल से भी मुश्किल था 
उनसे ये सुनना 
कि बेटा, मेरे बिस्तर से दूर रहो 
और जाओ जाकर फिर से हाथ धो लो।

बहुत दर्दनाक था... 
उनके ऑक्सीजन लेवल का एकदम से गिरना 
शरीर की तपन का वाष्प हो आँखों से रिसना 
'मैं घर पर ही ठीक हो जाउंगी' गुहार करना 
और अस्पताल के लिए तैयार थैले में कंघी, रबर बैंड और एक नया सूट रखवाना।

थोड़ा राहत भरा था... 
अस्पताल में उनके ऑक्सीजन लेवल का बढ़ना 
'आपका पेशेंट जल्द ही ठीक हो जाएगा' डॉक्टर का कहना
ऑक्सीजन मास्क में ही सही उन्हें वीडियो कॉल पर देखना  
और उम्मीदों का हल्की मुस्कान बन तैरना। 

डर से परिपूर्ण था
सुबह छह  बजे से उनका फ़ोन नहीं उठना 
अस्पताल का नंबर नहीं लगना 
डॉक्टर का फ़ोन नहीं उठना 
और अंततः डॉक्टर से संपर्क हो पाना 
और उनका सिर्फ यह बताना कि 
'शी इज ऑन वेंटिलेटर'।

असहनीय था.. 
असहनीय था.. 
ये अंदाजा होते हुए कि फ़ोन नहीं उठेगा 
हर घड़ी उनका नंबर मिलाना,
उनके वार्ड के बाहर खड़े हो 
उनसे मिलने देने की रिक्वेस्ट करना,
घर पहुँचने पर अस्पताल का फ़ोन बजना 
और उनके दम तोड़ने की खबर का 
घर के हर कोने तक जा पसरना।

जरुरी है...
बेहद जरुरी है... 
यादों की भीनी सुगंध से घर को महकाना  
और दुख दर्द को हकीकत की चादर ओढ़ 
हिम्मती सा नजर आना। 

Wednesday, 10 February 2021

लम्हें

वक़्त के जिस्म में
बहुत सारे लम्हें 

आत्मा बन रहा करते हैं.

जो कभी कोई
तुमसे कहे ना 
कि भूल जाओ गुज़रे वक़्त को 
तो बताना कि
क्या तालुक्क है
जिस्म और आत्मा के बीच.

चेताना कि अगली बार
जरा एहतियात बरते
जिस्म से आत्मा को शून्य
करने की बात कह्ने से पह्ले.

Friday, 13 March 2020

चित्र

करीबन सारे ही चित्र
मन की दराज से
बाहर निकालकर
फेंक दिए,
उफ्फ! बहुत कूड़ा करकट
जमा हो गया था।

पर कुछ चित्र हैं कि
यकायक, मुसलसल
भीतरी दराज में
बड़ी ही ढीठता से घुसते जा रहे हैं।

अरे! कितने निर्लज्ज हैं न ये।

निर्लज्ज नहीं। निस्सहाय।
क्योंकि ये जाएं भी तो कहां!
चित्र सहसा तो नहीं जन्मे होंगे न।

फिर भला क्यों इन्हें कोसा जाए,
कमबख्त फिर से कूड़ा करकट लौट आया!

Thursday, 30 January 2020

Why we met!

I often wonder
How we met!
Where we met!
But I simply
adore the question
Why we met!

My heart giggles
when it recalls
how we exchange
glances by seeing
something bizarre,
how our souls
feel bliss and dance
as someone is playing
around us guitar

How we play
silly games with
the palm of the hand,
how we unlearn
our great fears
by holding
each other's hand.

I simply love
the answer of
'why we met'
And I recite it fondly
each and every day.

Tuesday, 21 May 2019

बेहद करीबी शय मीलों के सफर सी होती है।

जब कभी तुम्हें
ज़िन्दगी ज़िंदा ना लगे
तो एक पल ठहर इसे पढ़ना।

कुछ दिनों से तुम
बेहद अस्त व्यस्त हो,
आंसुओं को तरल पदार्थ
के मानिंद निगल
रहे हो,
यकीनन ये सबसे
सरल काम है,
बेहद सरल।

पर सच कहूं तो
ये महज खुद से खुद की
दूरी है।

दूरी.. जितनी ख़ामोश जुबां और
उगलती आंखों के मध्य है।
दूरी उतनी जितनी
मुसलसल गिरते आंसुओं
और अंखियों के कोनों
तक रेंगते आए पानी के बीच है।
हां,ठीक उतनी ही दूरी
जितनी सच्चे प्रेमियों के
रूठने और मान जाने के बीच है।

सिर्फ इतनी सी ही दूरी
तय करनी है तुम्हें,
पर जानती हूं कि ये आसान नहीं।

क्योंकि अक्सर बेहद करीबी शय
मीलों के सफर सी होती है।

Friday, 5 April 2019

सच और झूठ

सच है सफर।
झूठ है मंजिलें।

सच है ज्ञानी।
झूठ है सर्वज्ञानी।

सच है नदियां।
झूठ है तालाब।

सच है नजर।
झूठ है आंखें।

सच है मृत्यु।
झूठ है बाकी सब।

Wednesday, 3 April 2019

कितना मैला हो गया है आदमी..

कंटीले झाड़ झाखड़ से
छलनी होताआदमी,
नदी की तेज धाराओं से
मचलता सा आदमी,
मेघों की गर्जन सुन
भीतर तक कांपता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।

मंदिरों में मूर्ति देख
पूजा अर्चना करता आदमी,
हीरे की खदानों में
सोने को तलाशता आदमी,
सुकून को आदिमानव मान
आंसुओं से खुश होता आदमी, 
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...