Wednesday, 3 April 2019

कितना मैला हो गया है आदमी..

कंटीले झाड़ झाखड़ से
छलनी होताआदमी,
नदी की तेज धाराओं से
मचलता सा आदमी,
मेघों की गर्जन सुन
भीतर तक कांपता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।

मंदिरों में मूर्ति देख
पूजा अर्चना करता आदमी,
हीरे की खदानों में
सोने को तलाशता आदमी,
सुकून को आदिमानव मान
आंसुओं से खुश होता आदमी, 
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।

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