सच है सफर।
झूठ है मंजिलें।
सच है ज्ञानी।
झूठ है सर्वज्ञानी।
सच है नदियां।
झूठ है तालाब।
सच है नजर।
झूठ है आंखें।
सच है मृत्यु।
झूठ है बाकी सब।
सच है सफर।
झूठ है मंजिलें।
सच है ज्ञानी।
झूठ है सर्वज्ञानी।
सच है नदियां।
झूठ है तालाब।
सच है नजर।
झूठ है आंखें।
सच है मृत्यु।
झूठ है बाकी सब।
कंटीले झाड़ झाखड़ से
छलनी होताआदमी,
नदी की तेज धाराओं से
मचलता सा आदमी,
मेघों की गर्जन सुन
भीतर तक कांपता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।
मंदिरों में मूर्ति देख
पूजा अर्चना करता आदमी,
हीरे की खदानों में
सोने को तलाशता आदमी,
सुकून को आदिमानव मान
आंसुओं से खुश होता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।
अजान ही
आशंकित हूं
भयभीत हूं
कुछ वक़्त के लिए
अचेत होना चाहती हूं।
मैं यहां बैठ सुन सकती हूं..
मेरे कान फट रहे हैं
बम की आवाज़ से
आवेश से भरी नारेबाजी से
सच, मैं अचेत होना चाहती हूं
उस चीख-चीत्कार से पहले।
मैं यहां बैठ देख पा रही हूं..
अपना मकान छोड़ भागते
वितृष्णा से भरे चेहरे,
सुन्न सा भाव लिए
वो बूढ़े काका,
न जाने क्या कौंधा
उनके भीतर
घर की चौखट को चूम
टेक आएं हैं माथा।
मेरे भीतर धुकधुकी हो उठी है
नहीं, मैं किसी की पक्षधर नहीं
न ही कोई पंथी हूं
अजान, अबूझ सी
आशंकित हूं
भयभीत हूं।
प्रेम।
मैं अक्सर एक असफल कोशिश
करती हूं
प्रेम को शब्दों में बांधने की।
कितनी बुद्धू हूं न..
समझ ही नहीं पाती
कि भला हवा को कैसे
बांधा जा सकता है।
पर...
प्रेम कभी सफल
यां असफल नहीं हो सकता,
यह हवा सा हमारे
इर्द गिर्द मौजूद ही रहता है।
उसका नाम कानों तक पहुंचते ही
धड़कनों का लजाना,
किवाड़ों की आड़ ले उसे निहारना,
उसके कदमों की आहट सुनते ही
जुल्फों को बिखराना,
और उसके सामने आते ही
अल्फाजों का गुम जाना,
प्रेम ही है।
प्रेम की नामौजूदगी में....
उसकी आवाज को सुन पाना
हर पल में उसका ख्याल होना
बीते वक्त की याद से
आंसुओं का ढुलक आना
और फिर मुस्कुरा कर
आंसुओं को अपनाना,
प्यार ही तो है।
कुछ है.....
जो मुझे बेचैन कर रहा है
भीतर ही भीतर।
कुछ है.....
जो चाहता है पुकार लगाना
करना चाहता है ध्वनित हरेक अक्षर
विशाल समुद्र सा रहता है
वो मेरे ही भीतर।
इसका मौन रहना
मुझे पसंद नहीं,
न ही पसंद
इसका उफान,
कौन है ये
कैसी असल प्रकृति इसकी
हूं अब तलक अनजान।
पर यकीनन कुछ है.....
जो मुझे बेचैन कर रहा है
भीतर ही भीतर।
Having a few minutes left to the clock ticking its hour and minute hand at the figure 12, I take a pen to write a little that I feel for this year or can say, for any other year.
Dear 2018,
Literally, I've much to say. Even I was intending to write a long farewell letter for you, but......!
(A verse for u)
Sometimes I felt your harshness,
tenderness at the other times.
Hate you for all the sobs.
Thank you for the sigh of relief
thereafter follows.
Sometimes I was a grave pessimist,
Optimist at the other times.
Grinning, Groaning, Limping, Prancing
I compared myself with the
phenomenon of the weather many times.
Thank you!
तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...