Sunday, 9 September 2018

कुछ कहानियां अधूरी-सी ही महकती हैं



कुछ जज्बात 
इनायत से लगते हैं,
कुछ अलफ़ाज़ 
गीली  माटी -सी सौगंध बिखेरते हैं,
कुछ शरारतें 
ताउम्र हसीन लगती हैं,
कुछ वादें 
कबूल-ए-दुआ से लगते हैं....


ख्वाहिश होती है
उन्हें आखिरी छोर तक 
ले जाने की 
पर कुछ कहानियां 
अधूरी-सी ही महकती हैं....  



Thursday, 30 August 2018

ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है...

जज़्ब किया है जो सदियों से भीतर 
उसे किसी नदी में उछालना है 
ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है। 

देखना है मुझे...
पहाड़...पहाड़ से ऊंचा पर्वत 
नदी...नदी की तेज़ धाराओं की करवट।
चट्टानें...चट्टानों में उभरी आकृतियां 
रेत के टीले...टीलों में छुपी सीपियाँ। 

जंगल...जंगलों का शाश्वत डर 
पंछी...पंछियों के पल दो पल के घर। 
झरने...झरनों का प्यारा शोर 
ऊंची ट्रॉली...ट्रॉलियों की मजबूत डोर। 

अनजाने लोग...लोगों की पोशाक, उनकी भाषा 
मंदिर मस्जिद...जहाँ खोज पाऊं ईश्वर की नई परिभाषा। 
खाली मैदान...उन मैदानों में मुझे एक पुकार लगाना है 
ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है।         

Thursday, 23 August 2018

मैं वो कहानी बनना चाहती हूं।

नहीं लिखनी मुझे कोई कविता
न ग़ज़ल लिखना चाहती हूं,
जिसे सुन तू सुकूं से सो सके
मैं वो कहानी बनना चाहती हूं।

बनना चाहती हूं रेशमी धागा
जो तेरे टूटे ख्वाबों, उधड़े जज्बातों
को सिल सके,
यां बन जाऊं वो तकिया
जिसे कसकर पकड़
तू बेझिझक रो सके।

बनना चाहती हूं वो एकांत
जहां बैठ तू खुद से गुफ्तगू कर सके,
यां बन जाऊं वो महफ़िल
जहां तेरा हर दर्द शून्य हो सके।

नहीं बनना चंदन,
न रोली बनना चाहती हूं,
जहां बांधे तू मन्नती धागे
मैं मंदिर-मस्जिद की वो मीनार बनना चाहती हूं।।

Sunday, 19 August 2018

जाग जाओ...अब तो खुदा भी रूठ रहा है।।

उत्तराखंड में अाई थी बाढ़
अब केरल डूब रहा है
समझे थे कि यहां खुदा बसते हैं
फिर भला ये क्यों हो रहा है!!

नहीं... नहीं..
जवाब की कोई चेष्टा नहीं
देनी तुम्हें कोई कुंठा नहीं
फिर क्यों हो परेशां कि
ये क्या हो रहा है,
ये तो वही है जो
हरवक्त नजरअंदाज हो रहा है।

जानती हूं...जानती हूं
वहां की जमीन में अाई दरारें
तुम्हारे मन के दरीचों को भी सालती हैं,
फिर क्यों करते हम वो गलती
जो भगवान को दोषी ठहराती है।

चलो..
चलो..
उठते हैं अब मैं और तुम
करते हैं वो ठीक
जो हमारे हिस्से से गलत हो रहा है
देखो ना...
अब तो खुद खुदा भी रूठ रहा है।

Sunday, 24 June 2018

कितना अच्छा लगता है न ...

कितना अच्छा लगता है न 

खुद से बतियाना

उंगलियों के पोरों पर चाय के प्याले की पकड़

अँखियों का शून्य में निहारना।

दिल की तमाम बेचैनियों को

दिल ही का समझाना,

काफी कुछ उधड़ा सा सिल जाता है

मुश्किल सही, नामुमकिन नहीं

दिल को बातों से बहलाना।


कितना अच्छा लगता है न

खुद के आगे रोना

न कोई झिझक, न कोई अटक

दिन.हफ्तों.महीनों से कैद आंसुओं का रिहा होना।

जज्ब किया जो भीतर आहिस्ता-आहिस्ता

तेजी से उसका बहना,

मुसलसल गिरते मोतियों का

सुकून के धागे में पिरोना।

Sunday, 17 June 2018

पिता का खौफ ना जाने क्यों नहीं बदला!

दशक बदले, माहौल बदला,
चादर रूपी समाज का धागा उधड़ा
पर पिता...
पिता का खौफ ना जाने क्यों नहीं बदला!

आज भी औलाद की फरमाइशें
उसके मसले
पिता तक मां ही पहुंचाती है,
'सिसकती औलाद' पिता के आगे
आने से कतराती है।

आखिर क्यों गब्बर जैसा डर
पिता के व्यक्तित्व में शामिल हुआ,
'सो जा, वरना गब्बर आ जाएगा'
का नया वर्जन
'आने दे पापा को..सब बताऊंगी' हुआ।

शायद इसलिए,
क्यूंकि गर पिता का खौफ न होता,
वो सख्त न होते
तो हम बच्चे इस दुनिया-ए-बाज़ार में
बेहद सस्ते दामों में बिक गए होते।

ज़िन्दगी से हासिल जख्मों का मूल्य
हम नहीं आँक पाते
गर पिता हर मुश्किल-ए-हालात में
आसानी से टूट जाते।

और गर तुम्हें लगता है कि
पिता को इतना खुरदुरा नहीं होना चाहिए,
तो कभी उनकी जिम्मेदारियों का झोला
अपने कंधे पर देख उठाइए।

आसान नहीं होता पिता-सा बनना
बहुत कुछ खर्च हो जाता है
नहीं मिलता मेहनताना।

Friday, 4 May 2018

कहाँ कुछ मेरा है..सबकुछ तो तेरा है।

खुदा के सजदे....

कहाँ कुछ मेरा है..सबकुछ तो तेरा है...
सोच भी तेरी, कलम भी तेरी
फिर क्यों लोग करते वाहवाही मेरी।

झूठ भी तेरा,  सच्चाई भी तेरी
फिर क्यों इस दुनिया में जवाबदारी मेरी।

राह भी तेरी, चाह भी तेरी
फिर कैसे कहूं कि वो मंजिल मेरी।

पागलपन भी तेरा, सयानापन भी तेरा
फिर कैसे कोई नादानी मेरी।

हाथ की लकीरें भी तेरी,
दर दर की ठोकरें भी तेरी
फिर कैसे कहूं कि मैं हूं मेरी।

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...