Monday, 14 January 2019

भीतर ही भीतर।

कुछ है.....
जो मुझे बेचैन कर रहा है
भीतर ही भीतर।

कुछ है.....
जो चाहता है पुकार लगाना
करना चाहता है ध्वनित हरेक अक्षर
विशाल समुद्र सा रहता है
वो मेरे ही भीतर।

इसका मौन रहना
मुझे पसंद नहीं,
न ही पसंद
इसका उफान,
कौन है ये
कैसी असल प्रकृति इसकी
हूं अब तलक अनजान।

पर यकीनन कुछ है.....
जो मुझे बेचैन कर रहा है
भीतर ही भीतर।

Monday, 31 December 2018

A sweet bye😊

Having a few minutes left to the clock ticking its hour and minute hand at the figure 12, I take a pen to write a little that I feel for this year or can say, for any other year.

Dear 2018,

Literally, I've much to say. Even I was intending to write a long farewell letter for you, but......!

(A verse for u)

Sometimes I felt your harshness,
tenderness at the other times.
Hate you for all the sobs.
Thank you for the sigh of relief
thereafter follows.

Sometimes I was a grave pessimist,
Optimist at the other times.
Grinning, Groaning, Limping, Prancing
I compared myself with the
phenomenon of the weather many times.

Thank you!

Sunday, 9 September 2018

कुछ कहानियां अधूरी-सी ही महकती हैं



कुछ जज्बात 
इनायत से लगते हैं,
कुछ अलफ़ाज़ 
गीली  माटी -सी सौगंध बिखेरते हैं,
कुछ शरारतें 
ताउम्र हसीन लगती हैं,
कुछ वादें 
कबूल-ए-दुआ से लगते हैं....


ख्वाहिश होती है
उन्हें आखिरी छोर तक 
ले जाने की 
पर कुछ कहानियां 
अधूरी-सी ही महकती हैं....  



Thursday, 30 August 2018

ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है...

जज़्ब किया है जो सदियों से भीतर 
उसे किसी नदी में उछालना है 
ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है। 

देखना है मुझे...
पहाड़...पहाड़ से ऊंचा पर्वत 
नदी...नदी की तेज़ धाराओं की करवट।
चट्टानें...चट्टानों में उभरी आकृतियां 
रेत के टीले...टीलों में छुपी सीपियाँ। 

जंगल...जंगलों का शाश्वत डर 
पंछी...पंछियों के पल दो पल के घर। 
झरने...झरनों का प्यारा शोर 
ऊंची ट्रॉली...ट्रॉलियों की मजबूत डोर। 

अनजाने लोग...लोगों की पोशाक, उनकी भाषा 
मंदिर मस्जिद...जहाँ खोज पाऊं ईश्वर की नई परिभाषा। 
खाली मैदान...उन मैदानों में मुझे एक पुकार लगाना है 
ऐसी एक यात्रा पर मुझे जाना है।         

Thursday, 23 August 2018

मैं वो कहानी बनना चाहती हूं।

नहीं लिखनी मुझे कोई कविता
न ग़ज़ल लिखना चाहती हूं,
जिसे सुन तू सुकूं से सो सके
मैं वो कहानी बनना चाहती हूं।

बनना चाहती हूं रेशमी धागा
जो तेरे टूटे ख्वाबों, उधड़े जज्बातों
को सिल सके,
यां बन जाऊं वो तकिया
जिसे कसकर पकड़
तू बेझिझक रो सके।

बनना चाहती हूं वो एकांत
जहां बैठ तू खुद से गुफ्तगू कर सके,
यां बन जाऊं वो महफ़िल
जहां तेरा हर दर्द शून्य हो सके।

नहीं बनना चंदन,
न रोली बनना चाहती हूं,
जहां बांधे तू मन्नती धागे
मैं मंदिर-मस्जिद की वो मीनार बनना चाहती हूं।।

Sunday, 19 August 2018

जाग जाओ...अब तो खुदा भी रूठ रहा है।।

उत्तराखंड में अाई थी बाढ़
अब केरल डूब रहा है
समझे थे कि यहां खुदा बसते हैं
फिर भला ये क्यों हो रहा है!!

नहीं... नहीं..
जवाब की कोई चेष्टा नहीं
देनी तुम्हें कोई कुंठा नहीं
फिर क्यों हो परेशां कि
ये क्या हो रहा है,
ये तो वही है जो
हरवक्त नजरअंदाज हो रहा है।

जानती हूं...जानती हूं
वहां की जमीन में अाई दरारें
तुम्हारे मन के दरीचों को भी सालती हैं,
फिर क्यों करते हम वो गलती
जो भगवान को दोषी ठहराती है।

चलो..
चलो..
उठते हैं अब मैं और तुम
करते हैं वो ठीक
जो हमारे हिस्से से गलत हो रहा है
देखो ना...
अब तो खुद खुदा भी रूठ रहा है।

Sunday, 24 June 2018

कितना अच्छा लगता है न ...

कितना अच्छा लगता है न 

खुद से बतियाना

उंगलियों के पोरों पर चाय के प्याले की पकड़

अँखियों का शून्य में निहारना।

दिल की तमाम बेचैनियों को

दिल ही का समझाना,

काफी कुछ उधड़ा सा सिल जाता है

मुश्किल सही, नामुमकिन नहीं

दिल को बातों से बहलाना।


कितना अच्छा लगता है न

खुद के आगे रोना

न कोई झिझक, न कोई अटक

दिन.हफ्तों.महीनों से कैद आंसुओं का रिहा होना।

जज्ब किया जो भीतर आहिस्ता-आहिस्ता

तेजी से उसका बहना,

मुसलसल गिरते मोतियों का

सुकून के धागे में पिरोना।

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...