Monday, 31 July 2023

बेचैनियां मोहक सी

बेचैनियां ओढ़े बैठा शख्स
बड़ा मोहक सा लगता है।
उसके भीतर 
कुछ पाने की जिद है
उस पा लेने के पीछे 
कुछ खोने का डर भी।
उस डर से पार पाने के
कईं तरीके हैं उसके पास
पर हर तरीके के साथ हैं
कुछ डिस्क्लेमर।


ये बेचैनियाँ कब राहत देंगी
भला कौन जाने
पर तय है कि जब कभी
बेचैनियां दूर होंगी
चैन की परिभाषा कुछ बदली सी होगी।।


Monday, 3 July 2023

मां बाप की बढ़ती उम्र

मां बाप की बढ़ती उम्र
एक डर पैदा करती है।
एक ऐसा डर
जो बेजुबां है, बेतुका भी। 

डर लगता है कि
साथ छूट जाएगा
एक तेज हवा का झोंका आएगा
और जमीन से वृक्ष उखड़ जायेगा।

अनजान नहीं कि
मृत्यु ही सत्य है
पर शायद यह मोह और डर का चल रहा
शाश्वत नृत्य है।

अलसुबह हो यां देर रात
फोन की घंटी तनिक नहीं सुहाती है
ये मां बाप की बढ़ती उम्र
जाने क्यों भीतर ही भीतर सालती है।

Sunday, 23 April 2023

सहसा गए लोग

 (*सहसा = अचानक)


सहसा गए लोग 

दरअसल कभी नहीं जाते। 


वो लौटते हैं 

वो कईं बार लौटते हैं 

छोटी छोटी बातों में 

बड़ी लम्बी सी रातों में। 


वो लौटते हैं साधारण सी 

रोजाना की जरूरतों में,

वो लौटते हैं 

कमरों में

लट्टे लिबासों में

पकवानों के स्वाद में 

मिलते जुलते कद काठी इंसानों में,

अबूझे अहसासों में 

वो लौटते हैं 

ईश्वर से नाराज़गी के रूप में भी,

और वो छिपे रहते हैं 

हँसती आँखों  के ठीक पीछे।


ईश्वर को खत्म कर देनी चाहिए 

ये सहसा वाली अपनी निष्ठुर हरकतें 

क्योंकि ये इंसानी दिल 

'सहसा' हुई रुख़सियतें नहीं झेल पाता। 

Monday, 6 March 2023

कहो कि बुरा लगता है

गुलाल, पिचकारी, गुब्बारे 

गर बाइक पर सवार

कोई भी यूँ ही दे मारे  

तो आँखों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


होली की मस्ती का सुरूर 

नशे में हो चूर 

गर कोई करे भद्दे मजाक 

तो कानों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


गुजिया, घेवर, मठरी के साए में 

होली गीतों के फूहड़ लिबास में 

गर कोई करे कैसा भी अपमान

तो तन मन पर चढ़ा गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है।  

Monday, 13 February 2023

मन की ही आराधना है

 शिव ने चुना गृहस्थ जीवन 

बुद्ध ने त्याग दिया 

परन्तु दोनों ही निर्विकार हुए 

क्योंकि अपने मन को आकार दिया। 


त्याग एक साध्य है 

गृहस्थ एक साधना है 

सब मन का खेल है 

मन की ही आराधना है। 


वरन मन की थाह बड़ी दुर्गम है, 

लोभ, मोह, माया का वृहत ये संगम है,

पर ढूंढने दें इसे अपना रास्ता 

इसे ना दें किसी का वास्ता। 

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...