कुछ लफ्ज़ उतारने की कसक है,
हर पल मुस्कुराना भी एक अदब है।
ना जाने क्यूँ इंसान कहता है कि,
ज़िन्दगी में सिर्फ उसी ने खोया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जो कभी ना रोया है।
कश्तियाँ डूब गईं,
मांझी देखता रहा,
लहरें बसाहटों से जा टकराईं,
बन्दा लाचार रहा,
फसलों को बूंदों की नज़र लग गई,
किसान कोसता रहा,
कुछ दिन कुछ न सूझा,
बस रुदन ही रुदन चलता रहा।
जबसे देखा आसपास,
तबसे समझ आया है,
जिसे ज़िन्दगी ने आजमाया,
उसपर ही खूब बरसाया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जिसने सिर्फ खोया, न पाया है।।
हर पल मुस्कुराना भी एक अदब है।
ना जाने क्यूँ इंसान कहता है कि,
ज़िन्दगी में सिर्फ उसी ने खोया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जो कभी ना रोया है।
कश्तियाँ डूब गईं,
मांझी देखता रहा,
लहरें बसाहटों से जा टकराईं,
बन्दा लाचार रहा,
फसलों को बूंदों की नज़र लग गई,
किसान कोसता रहा,
कुछ दिन कुछ न सूझा,
बस रुदन ही रुदन चलता रहा।
जबसे देखा आसपास,
तबसे समझ आया है,
जिसे ज़िन्दगी ने आजमाया,
उसपर ही खूब बरसाया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जिसने सिर्फ खोया, न पाया है।।
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