Friday, 22 April 2016

जद्दोजहद में हूँ

कोई जख्म नहीं, कोई घाव नहीं,
फिर भी मलहम की फ़िराक में हूँ,
कोई निंदक नहीं, कोई दुश्मन नहीं,
फिर भी एक कवच की तलाश में हूँ। 

कोई लेनदार नहीं, कोई देनदार नहीं,
फिर भी हिसाब रखने की आदत में हूँ,
कोई अधूरी ख्वाहिश नहीं,
कोई छोटी-सी भी फरमाइश नहीं,
फिर भी खुदा की इबादत में हूँ। 

कोई बेबसी नहीं, कोई दौड़-भाग नहीं,
फिर भी घड़ी-भर सुकून की चाह में हूँ,
कोई जिम्मेदारी नहीं, कोई जवाबदारी नहीं,
फिर भी उत्कृष्टता की कोशिश में हूँ। 

कोई दिखती सीमारेखा नहीं, कोई थकान नहीं,
फिर भी सामाजिक हदों में हूँ,
कोई जोर नहीं, कोई लादी गई उम्मीदें नहीं,
फिर भी अपना वजूद बनाने की जद्दोजहद में हूँ,
अपना वजूद बनाने की जद्दोजहद में हूँ।। 

Monday, 22 February 2016

माफ़ कीजिएगा

ट्रिंग-ट्रिंग की आवाज़ सुन,
मैंने उठाया फ़ोन,
हैलो के बाद पूछा-
'जी आप कौन?'
आवाज़ आई-
'राकेश है, राकेश?'
मैंने कहा-जी रॉंग नंबर है,
वो बोला- जी आप कौन हैं?
मैंने कहा जिस व्यक्ति से आप बात करना चाहते हैं,
वे यहाँ मौजूद नहीं हैं,
वो फिर बोल पड़ा,
'जी आप कौन बोल रही हैं?'
झुंझलाहट में मैंने रख दिया फ़ोन,
वो कहता ही रहा,
'जी आप कौन, जी आप कौन ?'

अब घरवालों की बारी थी,
इस रॉंग नंबर के बाद की तैयारी थी।
तीन सदस्य मौजूद थे घर में,
तीनों ने ही पूछा-'किसका फ़ोन था?',
मैंने कहा- 'रॉंग नंबर था',
पर जिज्ञासु मन कहाँ शांत बैठता,
बोले-'किसके लिए पूछ रहा था?',
मैंने कहा किसी राकेश के लिए फ़ोन था,
जवाब मिला- 'राकेश नहीं, नरेश कहा होगा',
उन तीन के आगे मैं हुई अल्पसंखयक,
कहा-'हो सकता है, मैंने गलत सुना होगा।'

इतने में ही फिर ट्रिंग-ट्रिंग बोल पड़ा,
मेरा मन अब जिद पर आ अड़ा,
नहीं उठाऊंगी फ़ोन,
साला, फिर पूछेगा कि आप कौन।
पर जिद को छोड़,उठाया फोन,
उन्हीं महाशय की आवाज़ आई,
कहने लगे- 'आप कौन?'

मैंने गुस्से में भी व्यवहार-कुशलता को बनाए रखा,
'तू' नहीं , 'आप' का ही दौर जारी रखा,
कहा- 'आपने लगाया है ना फोन,
और मैं बताऊँ आपको कि मैं हूँ कौन।'

वो शांतस्वर में बोला- 'मैडम मैं वही तो आपको बताना चाहता हूँ,
राकेश का मित्र हूँ, और उसी से बात करना चाहता हूँ',
मैंने क्रोधित हुए कहा-आप पृथ्वी से तो नहीं हो सकते,
आखिर किस ग्रह के प्राणी हैं,
जवाब मिला- जी हम सिर्फ और सिर्फ राकेश के सानी हैं।

मैं कुछ कहती ही कि वो खुशस्वर में बोल पड़ा,
'अरे अरे मैडम, राकेश तो यहीं आकर है खड़ा।'
मैंने कहा-जी बधाई हो आपको,
अब आगे से फ़ोन मत कीजिएगा,
वो बोला- मैडम वचन तो नहीं दे सकता,
'माफ़ कीजिएगा।'

Monday, 8 February 2016

भला, कौन है इस जहान में, जो कभी ना रोया है।

कुछ लफ्ज़ उतारने की कसक है,
हर पल मुस्कुराना भी एक अदब है।


ना जाने क्यूँ इंसान कहता है कि,
ज़िन्दगी में सिर्फ उसी ने खोया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जो कभी ना रोया है।

कश्तियाँ डूब गईं,
मांझी देखता रहा,
लहरें बसाहटों से जा टकराईं,
बन्दा लाचार रहा,
फसलों को बूंदों की नज़र लग गई,
किसान कोसता रहा,
कुछ दिन कुछ न सूझा,
बस रुदन ही रुदन चलता रहा।

जबसे देखा आसपास,
तबसे समझ आया है,
जिसे ज़िन्दगी ने आजमाया,
उसपर ही खूब बरसाया है,
भला, कौन है इस जहान में,
जिसने सिर्फ खोया, न पाया है।। 

Thursday, 31 December 2015

अलविदा 2015

हँसते खेलते ये साल भी गुज़र गया,
तारीखों का सिला यादों में ढल गया,
कोई कहेगा कि ये साल रफ़्तार पकड़ गया,
पर मैं कहूँगी कि अनुभवों में इज़ाफ़ा कर गया। 

उम्मीदों का थैला भर यहाँ दाखिल हुए,
अधूरी नज्मों को एक मुकाम देने की चाह लिए,
इरादा था कि, जहाँ तक नजर जाए, वहां तक समेट लूं,
मुट्ठियाँ तो भर गईं, पर इन ख्वाहिशों को क्या जवाब दूँ। 

थोड़ा सा उजाला चुरा, कहीं और बिखेरने की हसरत भी थी,
अपनी गुल्लक को मटमैली बस्ती में फोड़ने की जरूरत भी थी,
उम्मीदें थीं, आशाएं थीं, संग संग जंजीरें भी थीं,
पर आज एक कदम आगे और बीते कल एक कदम मैं पीछे भी थी। 

ऐसा नहीं कहूँगी कि मैं पंख संजोती रही,
और साल उड़ चला गया,
पर हाँ, काफी कुछ है, जो बाकी रह गया। 
 
चलिए, इस साल से विदा ले, नई तारीखों को रचते हैं,
शिद्दत और सब्र के साथ इक नई कहानी लिखते हैं,
 इक नई रूमानी लिखते हैं।।

Monday, 23 November 2015

ना जाने क्या लिखना है, शायद अल्फ़ाज़ों को कागज़ से मिलना है.....

ना जाने क्या लिखना है,
शायद अल्फ़ाज़ों को कागज़ से मिलना है.....

कलम खफा-सी है,
मन में एक उदासी है,
बड़े दिनों से इनसे मिले नहीं,
शायद तभी दिल में ख़ामोशी है।

चाहत बेहद रही कि,
इन कश्तियों को एक ठहराव दूँ,
ज़िन्दगी की इन छोटी-मोटी चोटों को,
अल्फ़ाज़ों की दवा-दुआ दूँ।
पर वक़्त कुछ अस्त-व्यस्त रहा,
अल्फ़ाज़ों का उमड़ाव भी ज़बरदस्त रहा,
न जाने कैसे तारीखें बदलती गईं,
दिन का वादा किया,
तो शाम ढल गई,
और जब रात का वादा किया,
तो थकी अँखियों में नींद भर गई।

आज इनसे माफ़ी मांगते हैं,
दिल-ए-समंदर में एक गोता लगाते हैं,
उम्मीद है, माफ़ किया जाएगा,
और गर ऐसा ही हुआ,
तो दिल-ए-शहर इक दफा फिर मुस्कुराएगा,
फिर मुस्कुराएगा।।

Friday, 25 September 2015

'महिला सशक्तिकरण'

रात के अँधेरे का जिक्र छोड़िये,
दिन के उजाले की ओर रुख मोड़िए। 

रात का अँधेरा तो बस यूँही बदनाम है,
उससे बड़े तो इस उजाले ने किए काम हैं। 

मत कहिए कि उजाले में नारी महफूज़ रहेगी,
बल्कि सोचिए, दिन की भीड़ उसे कितना कुछ कहेगी। 

बीत गई वो सदी, जब उजाला स्त्री का रक्षक था,
हज़ारों में से कोई एक ही भक्षक था,
पर अब इक्कीसवी सदी का दौर है,
कल की बातें अलग थीं, आज की बातें कुछ और हैं।  

इस देश के कथित समझदारों ने
क्या गज़ब बनाया मखौल है,
जिस वक़्त नारी सबसे ज्यादा असुरक्षित है,
उसे ही कहा, 'महिला सशक्तिकरण' का दौर है,
 'महिला सशक्तिकरण' का दौर है।

Friday, 14 August 2015

Aazaadi

आजाद। … आजादी....
सुने-सुनाए अल्फाज हैं ,
पर आज़ादी है क्या ?
ये जानना जटिल काज है। 

किताबें कहती 68 साल पुराना इतिहास हैं,
पर मैं २२ वर्ष पुरानी कैसे मान लूँ कि वतन आज़ाद है। 

कहते हैं देश में लोकतंत्र है,
यहाँ बसता 'प्रेम और एकता' का मूलमंत्र है,
सरकारी संपत्ति को सहजना चाहिए,
स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों पर चलना चाहिए,
                                जरा कोई पूछे संसद के हंगमेबाजों  से,
                                क्या उन्हें ये सब नहीं  समझना चाहिए ?

. कैसे?… आखिर कैसे? कह दूँ कि हिंदुस्तान आज़ाद है ,
जब मेरी कलम भी विदेशी फैक्ट्री में हुई ईजाद है। । 

अंत में..... 
शहीदों को नमन कर कहती हूँ कि,
हाँ , हमारी धरती आज़ाद है,
मेरे मुल्क में लोकतंत्र राज है,
चंद देशवासियों को ही सही,
भारत माँ से अटूट प्यार है,
इस देश के लिए मेरी जान भी निसार है। ।

     जय हिन्द 



बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...