Sunday, 4 September 2022

शिक्षक

अंडररेटेड काम

ओवररेटेड सम्मान 

कुछ और कर पाने में रहे नाकाम

इसलिए बन गए

शिक्षक राम 

यही लगता है न तुम्हें?


तो सुनो,

ये शिक्षक ही 

ओवररेटेड जॉब्स  का 

आधार है,

सबको समान समझा जाए 

इसका पैरोकार है,

इसकी गरिमा समझना 

इतना ना आसान है,

सिर्फ शिक्षक दिवस को ही जान पाओगे 

कि हरेक शिक्षक कितना महान है। 

Thursday, 25 August 2022

दर्द फौरी नहीं होता

 

रेलमपेल सी दुनिया में 

ठहराव नहीं होता

बारिश के बूँद सा गुम जाए 

दर्द इतना फौरी नहीं होता।


ये कुछ दिन मचलता है 

कुछ दिन दहकता है 

फिर जमकर बरसता है, 

पर दोस्त

ये किस्सा बरस जाने पर ही खत्म नहीं होता,

क्यूंकि दर्द इतना फौरी नहीं होता।


शांत समुद्र सा दिखे कुछ दिन 

फिर उद्वेलित सा 

फिर थमा सा 

और फिर रिसता रिसता 

गहरी पैठ पा जाता है, 

दरअसल दर्द जैसी शय का मुकाम 

इतना सस्ता नहीं होता 

दोस्त, दर्द फौरी नहीं होता।


जो तुम कहो कि 

दर्द की समय सीमा 

भी होनी चाहिए,

तो दोस्त 

घड़ी का कांटा और दर्द 

मित्रवत नहीं होता

और

गर तुम सोचो कि आंसुओं से 

तर होकर बाहर निकल आओगे 

तो जनाब फिर सुनो 

दर्द इतना फौरी नहीं होता।


Wednesday, 29 June 2022

देश एक भट्टी है

इंसान और इंसानियत की 

चल रही कट्टी है, 

साहिब, देश एक भट्टी है। 


अब चोखा अलग 

अलग लिट्टी है, 

ना कहो कि  

सबकी एक ही मिट्टी है 

साहिब, देश एक भट्टी है। 


आज प्रत्यक्ष है 

कल आशंकित है, 

भयभीत नजारों में भी 

उम्मीद लिए  बैठा 

कम्बख्त ये मन हठी है  

साहिब, देश एक भट्टी है। 



Sunday, 19 June 2022

पिता डरता है

मजबूत होती हैं माएं
पिता तो नाजुक सा होता है 
वो खुलकर रो लेती है 
पिता रोने से भी डरता है। 

स्वेटर बुनती मां है 
पिता ऊन लाता है
वो आम की फांके बांटती है 
पिता आम की मिठास ढूंढ लाता है। 

प्रेम की परिभाषा मां के हिस्से 
पिता का क्रोध जाना जाता है 
वो दुनिया की खूबसूरती सिखलाती है
पिता दुनिया से ही डरता है।

मां अपनी हर उम्र में
एक सी होती है
पर पिता जरूर बदलता है,
जवानी में कठोर
तो बुढ़ापे में नरम सा होने लगता है। 

यूं सोचो कि पिता तो आदमी है
फिर भला किससे डरता है!
अंदर की बात ये है कि पिता भी
एक आदमी से ही डरता है। 

































Friday, 6 August 2021

हिम्मती सा नजर आना

मुश्किल था.. 
मुश्किल था..
उन्हें रह रहकर खांसते देखना 
शरीर के तापमान का चढ़ना उतरना 
कमजोरी का आँखों से बदन के हर जर्रे तक जा पहुंचना 
और मुश्किल से भी मुश्किल था 
उनसे ये सुनना 
कि बेटा, मेरे बिस्तर से दूर रहो 
और जाओ जाकर फिर से हाथ धो लो।

बहुत दर्दनाक था... 
उनके ऑक्सीजन लेवल का एकदम से गिरना 
शरीर की तपन का वाष्प हो आँखों से रिसना 
'मैं घर पर ही ठीक हो जाउंगी' गुहार करना 
और अस्पताल के लिए तैयार थैले में कंघी, रबर बैंड और एक नया सूट रखवाना।

थोड़ा राहत भरा था... 
अस्पताल में उनके ऑक्सीजन लेवल का बढ़ना 
'आपका पेशेंट जल्द ही ठीक हो जाएगा' डॉक्टर का कहना
ऑक्सीजन मास्क में ही सही उन्हें वीडियो कॉल पर देखना  
और उम्मीदों का हल्की मुस्कान बन तैरना। 

डर से परिपूर्ण था
सुबह छह  बजे से उनका फ़ोन नहीं उठना 
अस्पताल का नंबर नहीं लगना 
डॉक्टर का फ़ोन नहीं उठना 
और अंततः डॉक्टर से संपर्क हो पाना 
और उनका सिर्फ यह बताना कि 
'शी इज ऑन वेंटिलेटर'।

असहनीय था.. 
असहनीय था.. 
ये अंदाजा होते हुए कि फ़ोन नहीं उठेगा 
हर घड़ी उनका नंबर मिलाना,
उनके वार्ड के बाहर खड़े हो 
उनसे मिलने देने की रिक्वेस्ट करना,
घर पहुँचने पर अस्पताल का फ़ोन बजना 
और उनके दम तोड़ने की खबर का 
घर के हर कोने तक जा पसरना।

जरुरी है...
बेहद जरुरी है... 
यादों की भीनी सुगंध से घर को महकाना  
और दुख दर्द को हकीकत की चादर ओढ़ 
हिम्मती सा नजर आना। 

Wednesday, 10 February 2021

लम्हें

वक़्त के जिस्म में
बहुत सारे लम्हें 

आत्मा बन रहा करते हैं.

जो कभी कोई
तुमसे कहे ना 
कि भूल जाओ गुज़रे वक़्त को 
तो बताना कि
क्या तालुक्क है
जिस्म और आत्मा के बीच.

चेताना कि अगली बार
जरा एहतियात बरते
जिस्म से आत्मा को शून्य
करने की बात कह्ने से पह्ले.

Friday, 13 March 2020

चित्र

करीबन सारे ही चित्र
मन की दराज से
बाहर निकालकर
फेंक दिए,
उफ्फ! बहुत कूड़ा करकट
जमा हो गया था।

पर कुछ चित्र हैं कि
यकायक, मुसलसल
भीतरी दराज में
बड़ी ही ढीठता से घुसते जा रहे हैं।

अरे! कितने निर्लज्ज हैं न ये।

निर्लज्ज नहीं। निस्सहाय।
क्योंकि ये जाएं भी तो कहां!
चित्र सहसा तो नहीं जन्मे होंगे न।

फिर भला क्यों इन्हें कोसा जाए,
कमबख्त फिर से कूड़ा करकट लौट आया!

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...