Sunday, 23 April 2023

सहसा गए लोग

 (*सहसा = अचानक)


सहसा गए लोग 

दरअसल कभी नहीं जाते। 


वो लौटते हैं 

वो कईं बार लौटते हैं 

छोटी छोटी बातों में 

बड़ी लम्बी सी रातों में। 


वो लौटते हैं साधारण सी 

रोजाना की जरूरतों में,

वो लौटते हैं 

कमरों में

लट्टे लिबासों में

पकवानों के स्वाद में 

मिलते जुलते कद काठी इंसानों में,

अबूझे अहसासों में 

वो लौटते हैं 

ईश्वर से नाराज़गी के रूप में भी,

और वो छिपे रहते हैं 

हँसती आँखों  के ठीक पीछे।


ईश्वर को खत्म कर देनी चाहिए 

ये सहसा वाली अपनी निष्ठुर हरकतें 

क्योंकि ये इंसानी दिल 

'सहसा' हुई रुख़सियतें नहीं झेल पाता। 

Monday, 6 March 2023

कहो कि बुरा लगता है

गुलाल, पिचकारी, गुब्बारे 

गर बाइक पर सवार

कोई भी यूँ ही दे मारे  

तो आँखों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


होली की मस्ती का सुरूर 

नशे में हो चूर 

गर कोई करे भद्दे मजाक 

तो कानों में उतार गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है। 


गुजिया, घेवर, मठरी के साए में 

होली गीतों के फूहड़ लिबास में 

गर कोई करे कैसा भी अपमान

तो तन मन पर चढ़ा गुलाल 

कहो कि बुरा लगता है।  

Monday, 13 February 2023

मन की ही आराधना है

 शिव ने चुना गृहस्थ जीवन 

बुद्ध ने त्याग दिया 

परन्तु दोनों ही निर्विकार हुए 

क्योंकि अपने मन को आकार दिया। 


त्याग एक साध्य है 

गृहस्थ एक साधना है 

सब मन का खेल है 

मन की ही आराधना है। 


वरन मन की थाह बड़ी दुर्गम है, 

लोभ, मोह, माया का वृहत ये संगम है,

पर ढूंढने दें इसे अपना रास्ता 

इसे ना दें किसी का वास्ता। 

Friday, 2 December 2022

कामकाजी स्त्रियां

स्त्रियां बड़ी शिद्दत से
घर बटोर ले जाया करती हैं किताबें
कि फुर्सत मिलते ही झट पढ़ लेंगी।
पर हर दफे बिना पन्ने पलटाए
ले आती हैं उन्हें वापस। कमोबेश उनका फुर्सत पाना भी
फुर्सत पाना नहीं होता।


फुर्सत में वो करती हैं
बहुतरे अंडररेटेड काम।
मसालेदानी में भरने लगती हैं
नमक और हल्दी,
फ्रीज में ढूंढने लगती हैं
परसों गिरी सब्जी के दाग,
पुरानी अखबारों के लिए ढूंढती हैं
एक नई जगह,
सर्द कपड़ों के लिए
छानती हैं पुरानी जगहें
और दसों कामों की फेहरिस्त लिए
घूमती हैं हॉल और किचन के भीतर बाहर।
दरअसल,
स्त्रियां किताबें खोलने से पहले
सिमट जाती हैं घर परिवार में।

Tuesday, 22 November 2022

मैं एक प्राइवेट कर्मचारी हूँ

 मेज से घूरती  धूल 

बिस्तर के छोरों से लटकती चदर 

फ्रिज के ऊपर रखी पिरामिडनुमा दवा बोतलें 

अलमारी के अंदर मचा घमासान 

ग़ुसलख़ाने की नाली पर आंदोलनरत केश 

मैले कपड़ों के पुलिंदे 

पानी को तरसते नन्हे पौधे 

गैस के चूल्हे पर जमा एक गैर जिद्दी दाग 

खाली नमक के डिब्बे के पास रखी भरी नमक की थैली 

दही हांडी वाले दृश्य जैसा डस्टबिन 

और अथक चेहरा 

मुझे पल पल एहसास दिलाता है कि 

मैं एक प्राइवेट कर्मचारी हूँ। 

Saturday, 24 September 2022

सुनो ! नौकरी करने वालों।

नौकरी उर्फ़ जॉब करने वालों, सुनो।

कुछ बातें तुम्हें कोई नहीं बताएगा

इसलिए तनिक ध्यान से सुनो।


किसी की रिकमेन्डेशन के बदले 

नौकरी खुद हासिल करना, 

क्योंकि अगर वो संस्था के अंदर हुआ 

तो अहसान तले दबे रहोगे।


तनख्वाह अपनी 

काबिलियत के हिसाब से पाना 

क्योंकि ज्यादा में घिसे जाओगे 

और कम में पिसे जाओगे। 


गर सीधे सादे हो तो 

थोड़ी चालाकियां सीख लेना, 

आँख कान खुले रखना, 

और नौकरी कितनी भी अच्छी हो 

स्वयं को निखारते रहना।


और अंत में यह....  

नौकरी बचाने की जगह 

अपनी आवाज़ बचाये रखना

क्योंकि आवाज़ ही वजूद है। 

Sunday, 4 September 2022

शिक्षक

अंडररेटेड काम

ओवररेटेड सम्मान 

कुछ और कर पाने में रहे नाकाम

इसलिए बन गए

शिक्षक राम 

यही लगता है न तुम्हें?


तो सुनो,

ये शिक्षक ही 

ओवररेटेड जॉब्स  का 

आधार है,

सबको समान समझा जाए 

इसका पैरोकार है,

इसकी गरिमा समझना 

इतना ना आसान है,

सिर्फ शिक्षक दिवस को ही जान पाओगे 

कि हरेक शिक्षक कितना महान है। 

बदला है तुम्हारा मन क्या?

तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...