मुश्किल था..
उन्हें रह रहकर खांसते देखना
शरीर के तापमान का चढ़ना उतरना
कमजोरी का आँखों से बदन के हर जर्रे तक जा पहुंचना
और मुश्किल से भी मुश्किल था
उनसे ये सुनना
कि बेटा, मेरे बिस्तर से दूर रहो
और जाओ जाकर फिर से हाथ धो लो।
करीबन सारे ही चित्र
मन की दराज से
बाहर निकालकर
फेंक दिए,
उफ्फ! बहुत कूड़ा करकट
जमा हो गया था।
पर कुछ चित्र हैं कि
यकायक, मुसलसल
भीतरी दराज में
बड़ी ही ढीठता से घुसते जा रहे हैं।
अरे! कितने निर्लज्ज हैं न ये।
निर्लज्ज नहीं। निस्सहाय।
क्योंकि ये जाएं भी तो कहां!
चित्र सहसा तो नहीं जन्मे होंगे न।
फिर भला क्यों इन्हें कोसा जाए,
कमबख्त फिर से कूड़ा करकट लौट आया!
जब कभी तुम्हें
ज़िन्दगी ज़िंदा ना लगे
तो एक पल ठहर इसे पढ़ना।
कुछ दिनों से तुम
बेहद अस्त व्यस्त हो,
आंसुओं को तरल पदार्थ
के मानिंद निगल
रहे हो,
यकीनन ये सबसे
सरल काम है,
बेहद सरल।
पर सच कहूं तो
ये महज खुद से खुद की
दूरी है।
दूरी.. जितनी ख़ामोश जुबां और
उगलती आंखों के मध्य है।
दूरी उतनी जितनी
मुसलसल गिरते आंसुओं
और अंखियों के कोनों
तक रेंगते आए पानी के बीच है।
हां,ठीक उतनी ही दूरी
जितनी सच्चे प्रेमियों के
रूठने और मान जाने के बीच है।
सिर्फ इतनी सी ही दूरी
तय करनी है तुम्हें,
पर जानती हूं कि ये आसान नहीं।
क्योंकि अक्सर बेहद करीबी शय
मीलों के सफर सी होती है।
सच है सफर।
झूठ है मंजिलें।
सच है ज्ञानी।
झूठ है सर्वज्ञानी।
सच है नदियां।
झूठ है तालाब।
सच है नजर।
झूठ है आंखें।
सच है मृत्यु।
झूठ है बाकी सब।
कंटीले झाड़ झाखड़ से
छलनी होताआदमी,
नदी की तेज धाराओं से
मचलता सा आदमी,
मेघों की गर्जन सुन
भीतर तक कांपता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।
मंदिरों में मूर्ति देख
पूजा अर्चना करता आदमी,
हीरे की खदानों में
सोने को तलाशता आदमी,
सुकून को आदिमानव मान
आंसुओं से खुश होता आदमी,
बादलों सा सफेद अंतस पाकर भी
कितना मैला हो गया है आदमी।
तारीख बदली है साल बदला है पर बदला है तुम्हारा मन क्या? है जश्न चारों ओर उमंग का न बूझे छोर पर क्या खोज पाए हो अपने मन की डोर? फैला है चहुँओर...